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Saturday, May 18, 2024

Kabir ke Dohe – Part 2 | कबीर के दोहे – भाग २

कामी क्रोधी लालची , इनसे भक्ति ना होए |
भक्ति करे कोई सूरमा , जाती वरण कुल खोय ||

बैद मुआ रोगी मुआ , मुआ सकल संसार |
एक कबीरा ना मुआ , जेहि के राम आधार ||

प्रेम न बड़ी उपजी , प्रेम न हात बिकाय |
राजा प्रजा जोही रुचे , शीश दी ले जाय ||

प्रेम प्याला जो पिए , शीश दक्षिणा दे |
लोभी शीश न दे सके , नाम प्रेम का ले ||

दया भाव ह्रदय नहीं , ज्ञान थके बेहद |
ते नर नरक ही जायेंगे , सुनी सुनी साखी शब्द ||

जहा काम तहा नाम नहीं , जहा नाम नहीं वहा काम |
दोनों कभू नहीं मिले , रवि रजनी इक धाम ||

ऊँचे पानी ना टिके , नीचे ही ठहराय |
नीचा हो सो भारी पी , ऊँचा प्यासा जाय ||

जब ही नाम हिरदय धर्यो , भयो पाप का नाश |
मानो चिनगी अग्नि की , परी पुरानी घास ||

सुख सागर का शील है , कोई न पावे थाह |
शब्द बिना साधू नहीं , द्रव्य बिना नहीं शाह ||

बाहर क्या दिखलाये , अंतर जपिए राम |
कहा काज संसार से , तुझे धानी से काम ||

फल कारन सेवा करे , करे ना मन से काम |
कहे कबीर सेवक नहीं , चाहे चौगुना दाम ||

कबीरा यह तन जात है , सके तो ठौर लगा |
कई सेवा कर साधू की , कई गोविन्द गुण गा ||

सोना सज्जन साधू जन , टूट जुड़े सौ बार |
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के , एइके ढाका दरार ||

जग में बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय |
यह आपा तो डाल दे , दया करे सब कोए ||

प्रेमभाव एक चाहिए , भेष अनेक बनाय |
चाहे घर में वास कर , चाहे बन को जाए ||

साधू सती और सुरमा , इनकी बात अगाढ़ |
आशा छोड़े देह की , तन की अनथक साध ||

हरी सांगत शीतल भय , मिति मोह की ताप |
निशिवासर सुख निधि , लाहा अन्न प्रगत आप्प ||

आवत गारी एक है , उलटन होए अनेक |
कह कबीर नहीं उलटिए , वही एक की एक ||

उज्जवल पहरे कापड़ा , पान सुपारी खाय |
एक हरी के नाम बिन , बंधा यमपुर जाय ||

अवगुण कहू शराब का , आपा अहमक होय |
मानुष से पशुआ भय , दाम गाँठ से खोये ||

कबीरा गरब ना कीजिये , कभू ना हासिये कोय |
अजहू नाव समुद्र में , ना जाने का होए ||

कबीरा कलह अरु कल्पना , सैट संगती से जाय |
दुःख बासे भगा फिरे , सुख में रही समाय ||

काह भरोसा देह का , बिनस जात छान मारही |
सांस सांस सुमिरन करो , और यतन कुछ नाही ||

कुटिल बचन सबसे बुरा , जासे हॉट न हार |
साधू बचन जल रूप है , बरसे अमृत धार ||

कबीरा लोहा एक है , गढ़ने में है फेर |
ताहि का बख्तर बने , ताहि की शमशेर ||

कबीरा सोता क्या करे , जागो जपो मुरार |
एक दिन है सोवना , लंबे पाँव पसार ||

कबीरा आप ठागइए , और न ठगिये कोय |
आप ठगे सुख होत है , और ठगे दुःख होय ||

गारी ही से उपजे , कलह कष्ट और भीच |
हारी चले सो साधू है , लागी चले तो नीच ||

जा पल दरसन साधू का , ता पल की बलिहारी |
राम नाम रसना बसे , लीजै जनम सुधारी ||

जो तोकू कांता बुवाई , ताहि बोय तू फूल |
तोकू फूल के फूल है , बंकू है तिरशूल ||

जो तू चाहे मुक्ति को , छोड़ दे सबकी आस |
मुक्त ही जैसा हो रहे , सब कुछ तेरे पास ||

ते दिन गए अकार्थी , सांगत भाई न संत |
प्रेम बिना पशु जीवन , भक्ति बिना भगवंत ||

तीर तुपक से जो लादे , सो तो शूर न होय |
माया तजि भक्ति करे , सूर कहावै सोय ||

तन को जोगी सब करे , मन को बिरला कोय |
सहजी सब बिधि पिये , जो मन जोगी होय ||

नहाये धोये क्या हुआ , जो मन मेल न जाय |
मीन सदा जल में रही , धोये बॉस न जाय ||

पांच पहर धंधा किया , तीन पहर गया सोय |
एक पहर भी नाम बिन , मुक्ति कैसे होय ||

पत्ता बोला वृक्ष से , सुनो वृक्ष बनराय |
अब के बिछड़े न मिले , दूर पड़ेंगे जाय ||

माया छाया एक सी , बिरला जाने कोय |
भागत के पीछे लगे , सन्मुख भागे सोय ||

या दुनिया में आ कर , छड़ी डे तू एट |
लेना हो सो लिले , उठी जात है पैठ ||

रात गवई सोय के दिवस गवाया खाय |
हीरा जन्म अनमोल था , कौड़ी बदले जाय ||

राम बुलावा भेजिया , दिया कबीरा रोय |
जो सुख साधू संग में , सो बैकुंठ न होय ||

संगती सो सुख उपजे , कुसंगति सो दुःख होय |
कह कबीर तह जाइए , साधू संग जहा होय ||

साहेब तेरी साहिबी , सब घट रही समाय |
ज्यो मेहंदी के पात में , लाली राखी न जाय ||

साईं आगे सांच है , साईं सांच सुहाय |
चाहे बोले केस रख , चाहे घौत मुंडाय ||

लकड़ी कहे लुहार की , तू मति जारे मोहि |
एक दिन ऐसा होयगा , मई जरौंगी तोही ||

ज्ञान रतन का जतानकर , माटि का संसार |
आय कबीर फिर गया , फीका है संसार ||

रिद्धि सिद्धि मांगूं नहीं , माँगू तुम पी यह |
निशिदिन दर्शन साधू को , प्रभु कबीर कहू देह ||

न गुरु मिल्या ना सिष भय , लालच खेल्या डाव |
दुनयू बड़े धार में , छधी पाथर की नाव ||

कबीर सतगुर ना मिल्या , रही अधूरी सीश |
स्वांग जाति का पहरी कर , घरी घरी मांगे भीष ||

यह तन विष की बेलरी , गुरु अमृत की खान |
सीस दिए जो गुरु मिले , तो भी सस्ता जान ||

राम पियारा छड़ी करी , करे आन का जाप |
बेस्या कर पूत ज्यू , कहै कौन सू बाप ||

जो रोऊ तो बल घटी , हंसो तो राम रिसाई |
मनही माहि बिसूरना , ज्यूँ घुन काठी खाई ||

सुखिया सब संसार है , खावै और सोवे |
दुखिया दास कबीर है , जागे अरु रावे ||

परबत परबत मै फिरया , नैन गवाए रोई |
सो बूटी पौ नहीं , जताई जीवनी होई ||

कबीर एक न जन्या , तो बहु जनया क्या होई |
एक तै सब होत है , सब तै एक न होई ||

पतिबरता मैली भली ,गले कांच को पोत |
सब सखियाँ में यो दिपै ,ज्यो रवि ससी को ज्योत ||

भगती बिगाड़ी कामिया , इन्द्री करे सवादी |
हीरा खोया हाथ थाई , जनम गवाया बाड़ी ||

परनारी रता फिरे , चोरी बिधिता खाही |
दिवस चारी सरसा रही , अति समूला जाहि ||

कबीर कलि खोटी भाई , मुनियर मिली न कोय |
लालच लोभी मस्कारा , टिंकू आदर होई ||

कबीर माया मोहिनी , जैसी मीठी खांड |
सतगुरु की कृपा भई , नहीं तोउ करती भांड ||

मेरे संगी दोई जरग , एक वैष्णो एक राम |
वो है दाता मुक्ति का , वो सुमिरावै नाम ||

संत न बंधे गाठ्दी , पेट समाता तेई |
साईं सू सन्मुख रही , जहा मांगे तह देई ||

जिस मरने यह जग डरे , सो मेरे आनंद |
कब महिहू कब देखिहू , पूरण परमानन्द ||

कबीर घोडा प्रेम का , चेतनी चढ़ी अवसार |
ज्ञान खडग गहि काल सीरी , भली मचाई मार ||

कबीर हरी सब को भजे , हरी को भजै न कोई |
जब लग आस सरीर की , तब लग दास न होई ||

क्या मुख ली बिनती करो , लाज आवत है मोहि |
तुम देखत ओगुन करो , कैसे भावो तोही ||

सब काहू का लीजिये , साचा असद निहार |
पछ्पात ना कीजिये कहै कबीर विचार ||

कुमति कीच चेला भरा , गुरु ज्ञान जल होय |
जनम जनम का मोर्चा , पल में दारे धोय ||

गुरु सामान दाता नहीं , याचक सीश सामान |
तीन लोक की सम्पदा , सो गुरु दीन्ही दान ||

गुरु को सर रखिये , चलिए आज्ञा माहि |
कहै कबीर ता दास को , तीन लोक भय नाही ||

गुरू मूर्ती गती चंद्रमा, सेवक नैन चकोर |
आठ पहर निरखता रहे, गुरू मूर्ती की ओर ||

गुरू सो प्रीती निबाहिया, जेही तत निबटई संत |
प्रेम बिना धिग दूर है, प्रेम निकत गुरू कंत ||

गुरू बिन ज्ञान न उपजई, गुरू बिन मलई न मोश |
गुरू बिन लाखाई ना सत्य को, गुरू बिन मिटे ना दोष ||

गुरू मूर्ति अगे खडी, दुनिया भेद कछू हाही |
उन्ही को पर्नाम करी, सकल तिमिर मिटि जाही ||

मूल ध्यान गुरू रूप है, मूल पूजा गुरू पाव |
मूल नाम गुरू वचन हाई, मूल सत्य सतभाव ||

साधु शब्द समुद्र है, जामे रत्न भराय |
मंद भाग मुट्ठी भरे, कंकर हाथ लगाये ||

पूत पियारौ पिता कू, गोहनी लागो धाई |
लोभ मिथाई हाथि दे, अपन गयो भुलाई ||

जा कारनी मे ढूँढती , सन्मुख मिलिया आई |
धन मैली पीव ऊजला, लागी ना सकौ पाई ||

भारी कहौ तो बहु दरौ, हलका कहु टू झूत |
माई का जानू राम कू, नैनू कभू ना दीथ ||

दीथा है तो कस कहू, कह्य ना को पतियाय |
हरी जैसा है तैसा रहो, तू हर्शी-हर्शी गुन गाई ||

पहुचेंगे तब कहेंगे, उमडेंगे उस ट्ठाई |
अझू बेरा समंड मे, बोली बिगूचे काई ||

मेरा मुझमे कुछ नही, जो कुछ है सो तोर |
तेरा तुझको सउपता, क्या लागई है मोर ||

जबलग भागती सकामता, तबलग निर्फल सेव |
कहई कबीर वई क्यो मिलई, निहकामी निज देव ||

कबीर कलिजुग आई करी, कीये बहुत जो मीत |
जिन दिलबंध्या एक सू, ते सुखु सोवै निचींत ||

कबीर कूता राम का, मुटिया मेरा नाऊ |
गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊं ||

कामी अमि नॅ ब्वेयी, विष ही कौ लई सोढी |
कुबुद्धि ना जाई जीव की, भावै स्वमभ रहौ प्रमोधि ||

कामी लज्या ना करई, मन माहे अहीलाड़ |
नींद ना मगई संतरा, भूख ना मगई स्वाद ||

ग्यानी मूल गवैया, आपन भये करता |
ताते संसारी भला, मन मे रहै डरता ||

इहि उदर कई करने, जग जाच्यो निस् जाम |
स्वामी-पानो जो सीरी चढयो, सर्यो ना एको काम ||

स्वामी हुआ सीतका , पैकाकार पचास |
रामनाम कथई रह्या , करै सीशा की आस ||

आग जो लगी समंद में, धुंआ न परगट होए ।
सो जाने जो जरमुआ जाकी लगी होए ॥

आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद ।
नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद ॥

आज कहे हरि कल भजुंगा, काल कहे फिर काल ।
आज कालके करत ही, अवसर जासी चाल ॥

आसन मार गुफा में बैठे, मनवा चहु दिश जाये ।
भवसागर घट बिच बिराजे, खोजन तीरथ जाये ॥

आसन मारे क्या भया, मरी न मन की आस ।
तैली केरा बैल ज्यों, घर ही कोस पचास ॥

आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बाँधि जंजीर ॥

अकथ कहानी प्रेम की, कुछ कही न जाए ।
गूंगे केरी सरकारा, बैठे मुस्काए ॥

अन्मंगा उत्तम कहा, मद्यम मांगी जो लेय ।
कहे कबीर निकृष्ट, सो पर धरना देय ॥

अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय ।
यों जल छूटी माछरी, तलफत रैन बिहाय ॥

अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥

अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान ।
हरि की बातें दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥

अपनी कहे मेरी सुने, सुनी मिली एकै हौय ।
हमरे देखत जग जात है, ऐसा मिला न कोय ॥

आशा जीवे जग मरे, लोग मरे मरी जाई ।
सोई सूबे धन संचते, सो ऊबरे जे खाई ॥

आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत ।
जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत ॥

आशा करै बैकुण्ठ की, दुरमति तीनों काल ।
शुक्र कही बलि ना करीं, ताते गयो पताल ॥

अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट ।
चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पठन को फूट ॥

अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ ।
मानुष से पशुआ करे, दाय गाँठ से खात ॥

अवगुन को तो ना गहे, गुन हि को ले बीन ।
घट घट महके मधुप ज्यों, परमातम ले चीन्ह ॥

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥

बानी से पहचानिए, साम चोर की घात ।
अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह कई बात ॥

बहता पानी निर्मला, बंधा गंदा होय ।
साधु जन रमता भला, दाग न लागे कोय ॥

बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार ।
दोऊ चूकि खाली पड़े, ताको वार न पार ॥

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥

बलिहारी वा दूध की, जामे निकसे घीव ।
घी साखी कबीर की, चार वेद का जीव ॥

बन्दे तू कर बंदगी, तो पावे दिदार ।
अवसर मानुष जनम का बहुरी न बारंबार ॥

भज दीना कहूँ और ही, तन साधुन के संग ।
कहैं कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग ॥

भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि ।
कहैं कबीर बोया घना, निपजे कोऊ एक ठांहि ॥

भक्ति भजन हरि नाम है, दूजा दुःख अपार ।
मनसा वाचा कर्मणा, कबीर सुमिरन सार ॥

भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय ।
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥

भक्ति महल बहु ऊँच है, दूर ही से दर्शाय ।
जो कोई जन भक्ति करे, शोभा बरनी ना जाय ॥

भेष देख ना पुजिये, पूछ लीजिये ज्ञान ।
बिना कसौटी होंत नाही, कंचन की पहचान ॥

भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग ।
भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग ॥

बिन रखवारे बाहिरा, चिड़ियों खाया खेत ।
अरधा परधा ऊबरे, चेति सके तो चेत ॥

बुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़या कलंक ।
और पखेरू पी गये, हंस न बौवे चंच ॥

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय ।
दुई पाटन के बीचमें साबूत बचा न कोय ॥

चन्दन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार ।
वाके अग्ङ लपटा रहे, मन मे नाहिं विकार ॥

चर्चा करो तो चौहटे, ज्ञान करो तो दोय ।
ध्यान धरो तब एकला, और न दूजा कोय ॥

चींटी चावल ले चली, बीच में मिल गई दाल ।
कहैं कबीर दोऊ ना मिले, एक ले दूजी डाल ॥

छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार ।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥

छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय ॥

दान दिए धन ना घटे, नदी ना घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥

दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावे दास ।
पानी के पीये बिना, कैसे मिटे पियास ॥

दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन ।
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥

दास कहावन कठिन है, मैं दासन का दास ।
अब तो ऐसा होए रहुं, ज्यों पांव तले की घास ॥

दया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय ॥

दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट ।
पूरा किया बिसाहना, बहुरि न आँवौं हट्ट ।।

आया था किस काम को, तू सोया चादर तान ।
सूरत सम्भाल ये गाफील, अपना आप पहचान ॥

दीठा है तो कस कहुं, कहुं तो को पतियाय ।
हरि जैसा तैसा रहे, तुं हरषि हरषि गुण गाय ॥

दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गर्जी ।
कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥

दुख लेने जावै नहीं, आवै आचा बूच ।
सुख का पहरा होयगा, दुख करेगा कूच ॥

दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि ।
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि ॥

दुर्बल को न सताइये, जा की मोटी हाय ।
बिना जीव की श्वास से, लोह भसम हो जाय ॥

एक बुन्द से सब किया, नर नारी का काम ।
सो तूं अंतर खोजी ले, सकल व्यापक राम ॥

एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार ।
है जैसा तैसा रहे, रहे कबीर विचार ॥

एक शब्द गुरुदेव का, ताका अनंत विचार ।
थके मुनि जन पंडिता, वेद न पावे पार ॥

एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय ।
एक से परचे भया, एक मोह समाय ॥

गाहक मिलै तो कुछ कहूं, न तर झगड़ा होय ।
अन्धों आगे रोइये अपना दीदा खोय ॥

गारी ही सों ऊपजे ,कलह, कष्ट और मींच ।
हरि चले सो साधु है, लागी चले तो नीच ॥

गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हर का सेव ।
कहे कबीर बैकुण्ठ से, फेर दिया शुक्देव ॥

घट घट मेरा साईंयां, सुनी सेज न कोय ।
बलिहारी घट तासु की, जा घट परघट होय ॥

घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।
बाल सने ही सांइया, आवा अन्त का यार ॥

घी के तो दर्शन भले, खाना भला न तेल ।
दाना तो दुश्मन भला, मूरख का क्या मेल ॥

गुरु धोबी सिख कपडा, साबू सिरजन हार ।
सुरती सिला पर धोइए, निकसे ज्योति अपार ॥

गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल ।
लोक वेद दोनों गये, आये सिर पर काल ॥

गुरु बिचारा क्या करे, सिक्खहि माहिं चूक ।
भावे त्यों परबोधिये, बांस बजाये फूँक ॥

गुरु बिन ज्ञान न ऊपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष ।
गुरु बिन लिखे न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष ॥

गुरु को कीजै बंदगी, कोटि कोटि परनाम ।
कीट न जाने भृंग को , गुरु करले आप सामान ॥

ग्यान प्रकासा गुरु मिला, सों जिनि बीसरिं जाइ ।
जब गोविंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आई ।।

ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार ।
हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ॥

हद में चले सो मानव, बेहद चले सो साध ।
हद बेहद दोनों तजे, ताको बता अगाध ॥

हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाय ।
आपन तो समुझै नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय ॥

हरि कृपा तब जानिए, दे मानव अवतार ।
गुरु कृपा तब जानिए, मुक्त करे संसार ॥

हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप ।
निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप ॥

हरिजन हरि तो एक है, जो आपा मिट जाय ।
जा घट में आपा बसे, साहिब कहां समाय ॥

हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार ।
हारा तो हरि से मिले, जीता जम के द्वार ॥

हरिया जाने रुखड़ा, जो पानी का गेह ।
सूखा काठ न जान ही, केतुउ बूड़ा मेह ॥

हीरा पडा बाज़ार में, रहा छार लिपटाय ।
बहुतक मूरख चले गये, कोई पारखी लिया उठाय ॥

हीरा सोई सराहिये, सहे घनन की चोट ।
कपट कुरंगी मानवा, परखत निकला खोट ॥

हीरा वहाँ ना खोलिये, जहाँ कुजड़ों की हाट ।
बांधो चुप की पॉटरी, लागहू अपनी बाट ॥

हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हेराय ।
बूँद समानी समुंदर में, सो कत हेरी जाय ॥

हेत बिना आवे नहीं, हेत तहां चली जाय ।
कबीर जल और संतजन, नमे तहां ठहराय ॥

हिल मिल खेले शब्द सों, अंतर रही न रेख ।
समुझे का मत एक है, क्या पंडित क्या शेख ॥

हिम से पानी हो गया, पानी हुआ भाप ।
जो पहिले था सो भया, प्रगटा आप हि आप ॥

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान ।
जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्रान ॥

जा करण जग ढ़ूँढ़िया, सो तो घट ही मांहि ।
परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं ॥

जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारी ।
राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारि ॥

जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय ।
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥

जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच ।
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥

जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप ।
पुछुप बास तें पामरा, ऐसा तत्व अनूप ॥

जाप मरे, अजापा मरे, अनहद हू मरी जाय ।
राम स्नेही ना मरे, कहे कबीर समझाय ॥

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई ।
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई ॥

जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय ।
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावें सोय ॥

जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव ।
कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव ॥

जब तू आया जगत में, लोग हँसे तू रोय ।
ऐसी करनी ना करी, पाछे हँसे सब कोय ॥

जहाँ आप तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
कह कबीर यह क्यों मिटैं, चारों बाधक रोग ॥

जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम ।
दोनों कबहूँ नहिं मिले, रवि रजनी इक धाम ॥

जैसी भक्ति करे सभी, वैसे पूजा होये ।
भय पारस है जीव को, निर्भय होय ना कोये ॥

जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम ।
माता प्यारा बारका, भगति प्यारा नाम ॥

जीवत समझे जीवत बुझे, जीवत ही करो आस ।
जीवत करम की फाँसी न कटे, मुए मुक्ति की आस ॥

झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद ।
जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद ॥

जिन गुरु जैसा जानिया, तिन को तैसा लाभ ।
ओसे प्यास न भागसी, जब लगि धसे न आभ ॥

जिस मरने से जग डरे, मेरे मन में आनंद ।
कब मरू कब पाऊ, पूरण परमानन्द ॥

जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार ।
जीवा ऐसा पाहौना, मिले ना दूजी बार ॥

जो जन भीगे रामरस, विगत कबहूँ ना रूख ।
अनुभव भाव न दरसते, ना दु:ख ना सुख ॥

जो रोऊ तो बल घटी, हंसो तो राम रिसाई |
मनही माहि बिसूरना, ज्यूँ घुन काठी खाई ||

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल ।
तोहि फूल को फूल है वाको है त्रिशूल ॥

जो तु चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस ।
मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ॥

जोगी होके जागा नाहि, चौरासी भरमाये ।
जोग जुगत सो दास कबीरा, अलख निरंजन पाये ॥

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माहिं ।
मूर्ख लोग न जानिए, बाहर ढ़ूंढ़त जांहि ॥

काचे गुरु के मिलन से, अगली भी बिगडी |
चाले थे हरि मिलन को, दूनी विपत पडी ॥

ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार ।
हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ॥

झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद ।
जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद ॥

टेक करे सो बावरा, टेक हि होवे हानि ।
जो टेक हि साहिब मिले, सोई टेक परमान ॥

तन बोहत मन काग है, लक्ष योजन उड़ जाय ।
कबहु के धर्म अगम दयी, कबहुं गगन समाय ॥

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर ।
तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर ॥

तारा मंडल बैठि के, चांद बडाई खाय ।
उदय भया जब सूर्य का, तब तारा छिप जाय ॥

तिमिर गया रवि देखते, कुमति गयी गुरु ज्ञान ।
सुमति गयी अति लोभाते, भक्ति गयी अभिमान ॥

तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय ।
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय ॥

तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥

तू तू करता तू भया, मुझमें रही न हूँ ।
बारी फेरी बलि गई, जित देखू तित तू ॥

ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत ।
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥

तेरा साँई तुझमें, ज्यों पहुपन में बास ।
कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास ॥

दया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय ॥

दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन ।
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥

दान दिए धन ना घटे, नदी ना घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥

दास कहावन कठिन है, मैं दासन का दास ।
अब तो ऐसा होए रहुं, ज्यों पांव तले की घास ॥

दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावे दास ।
पानी के पीये बिना, कैसे मिटे पियास ॥

दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गर्जी ।
कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥

दीठा है तो कस कहुं, कहुं तो को पतियाय ।
हरि जैसा तैसा रहे, तुं हरषि हरषि गुण गाय ॥

दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट ।
पूरा किया बिसाहना, बहुरि न आँवौं हट्ट ।।

दुख लेने जावै नहीं, आवै आचा बूच ।
सुख का पहरा होयगा, दुख करेगा कूच ॥

दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि ।
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि ॥

दुर्बल को न सताइये, जा की मोटी हाय ।
बिना जीव की श्वास से, लोह भसम हो जाय ॥

नगर चैन तब जानिये, एक ही राजा होय ।
यह दुराजी राज में, सुखी न देखा कोय ॥

नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिंम नहीं शीतल होय ।
कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय ॥

ना गुरु मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव ।
दुन्यू बूड़े धार में, चढ़ि पाथर की नाव ॥

नाम बिना बेकाम है, छप्पन भोग विलास ।
क्या इन्द्रासन बैठना, क्या वैकुंठ निवास ॥

नारी पुरुष सब ही सुनो, यह सतगुरु की साख ।
विष फल फले अनेक है, मत देखो कोई चाख ॥

नींद निशानी मौत की, ऊठ कबीरा जाग ।
और रसायन छोड़ के, नाम रसायन लाग ॥

नीर पियावत क्या फिरै, सायर घर-घर बारि ।
जो त्रिषावन्त होइगा, सो पीवेगा झखमारि ॥

नैना अंतर आव तू, नैन झापी तोही लेऊ ।
न में देखू और को, न तोही देखन देऊ ॥

पखा पाखी के कारने, सब जग रहा भुलान ।
निरपख होयके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥

पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान ।
भीतर ताप जू जगत का, घड़ी न पड़ती सान ॥

मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय ।
बार-बार के मुड़ते, भेड़ न बैकुण्ठ जाय ॥

पढी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार ।
आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार ॥

पढि पढि तो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जो चोर ।
जिस पढ़ने साहिब मिले, सो पढ़ना कछु और ॥

पहिले यह मन काग था, करता जीवन घात ।
अब तो मन हंसा, मोती चुनि-चुनि खात ॥

पखा पाखी के कारने, सब जग रहा भुलान ।
निरपख होयके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥

पर नारी का राचना, ज्यूं लहसून की खान ।
कोने बैठे खाइये, परगट होय निदान ॥

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय ।
कबहुं छेड़ि न देखिये, हंसि हंसि खावे रोय ॥

परबत-परबत मैं फिरा, नयन गंवाया रोय।
सो बूटी पाऊं नहीं, जाते जीवन होय॥

पतिव्रता मैली भली, गले कांच को पोत ।
सब सखियन में यों दिपै, ज्यों रवि ससि को जोत ॥

पतिव्रता मैली,काली कुचल कुरूप ।
पतिव्रता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय ।
अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥

पत्ता तूटा डाल से, ले गयी पवन उडाय ।
अबके बिछडे ना मिले, दूर पडेंगे जाय ॥

पीछैं लागा जाइ था, लोक वेद के साथि।
आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि ।।

पहले अगन बिरहा की, पाछे प्रेम की प्यास ।
कहे कबीर तब जानिए, नाम मिलन की आस ॥

पहले शब्द पहचानिये, पीछे कीजे मोल ।
पारखी परखे रतन को, शब्द का मोल ना तोल ॥

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम ।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुन दाम ॥

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥

पोथी बांचे याद करावे, भक्ति कछु नहीं पाये ।
मनका मनका फिरे नाहि, तुलसी माला फिराये ॥

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय ॥

प्रेम बिना धीरज नहीं, बिरह बिना बैराग ।
सतगुरु बिना मिटते नहीं, मन मनसा के दाग ॥

प्रेम गली अति संकरी, तामें दाऊ न समाई ।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं ॥

प्रेम न बड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥

प्रेम पांवरी पहन के, धीरज काजल देय ।
शील सिंदूर भराय के, तब पिया का सुख लेय ॥

प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥

प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय ।
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय ॥

प्रेमी ढूँढत में फिरू, प्रेमी मिलिया न कोय ।
प्रेमी को प्रेमी मिले, तब विष अमृत होय ॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।
जो सुख साधु सगं में, सो बैकुंठ न होय ॥

राम-नाम कै पटं तरै, देबे कौं कुछ नाहिं ।
क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥

राम पियारा छांड़ि करि, करै आन का जाप ।
बेस्या केरा पूतं ज्यूं, कहै कौन सू बाप ॥

राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस ।
रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥

राम रसायन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल ।
कबीर पीवत दुर्लभ है, मांगे सीस कलाल ॥

राम-रहीम एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परौ मति कोय।।

ॠद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह ।
निसि दिन दरशन शाधु को, प्रभु कबीर कहुँ देह ॥

रुखा सुखा खाई के, ठंडा पानी पी ।
देख पराई चुपड़ी, मत ललचाओ जी ॥

साँझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय ।
चल चकवा वा देश को, जहाँ रैन नहिं होय ॥

सब आए इस एक में, डाल-पात फल-फूल ।
कबिरा पीछा क्या रहा, गह पकड़ी जब मूल ॥

सब धरती कारज करूँ, लेखनी सब बनराय ।
सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा न जाय ॥

सब ही भूमि बनारसी, सब नीर गंगा तोय ।
ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय ॥

सबते लघुताई भली, लघुता ते सब होय ।
जौसे दूज का चन्द्रमा, शीश नवे सब कोय ॥

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाही ।
धन का भूखा जो फिरे, सो तो साधू नाही ॥

साधु चाल जो चालई, साधु कहावे सोय ।
बिन साधन तो सुधि नहीं, साधु कहां ते होय ॥

साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय ।
आगे-पीछे हरि खड़े जब भोगे तब देय ॥

साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध ।
आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध ॥

साधु शब्द समुद्र है, जा में रतन भराय ।
मंद भाग्य मुठ्ठी भरे, कंकर हाथ लगाय ॥

साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय ।
ज्यों मेहंदी के पात में, लाली लखी न जाय ॥

साईं आगे साँच है, साईं साँच सुहाय ।
चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट मुण्डाय ॥

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

सांई मेरा बानिया, सहज करे व्योपार ।
बिन डांडी बिन पालडे, तोले सब संसार ॥

साँई ते सब होते है, बन्दे से कुछ नाहिं ।
राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं ॥

सज्जन जन वही है जो, ढाल सरीखा होए ।
दुःख में आगे रहे, सुख में पाछे होए ॥

समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥

संगत कीजै साधु की, होये दिन-दिन हेत ।
साकुट काली कामली, धोवत होय न श्वेत ॥

संगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय ।
कह कबीर तहँ जाइये, साधु संग जहँ होय ॥

संत ही में सत बांटई, रोटी में ते टूक ।
कहे कबीर ता दास को, कबहूँ न आवे चूक ॥

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत ।
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत ॥

सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह ।
लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह ॥

सतगुर हम सूं रीझि करि, एक कह्मा कर संग ।
बरस्या बादल प्रेम का, भींजि गया अब अंग ॥

सतगुरु चले शिकार पर, ले कर तीर-कमान ।
मूरख मूरख बच गये, कोई मर गये संत सुजान ॥

सतगुरु कै सदकै करूँ, दिल अपनीं का साँच ।
कलिजुग हम सौं लड़ि पड़ा, मुहकम मेरा बाँच ।।

सतगुरु की माने नहीं, अपनी कहे बनाय ।
कहैं कबीर क्या कीजिये, और मता मन मांहि ॥

सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार ।
लोचन अनँत उघारिया, अनँत दिखावनहार ।।

सतगुरु मिला तो सब मिले, ना तो मिला न कोय ।
मात पिता सूत बान्धवा, यह तो घर घर होय ॥

सतगुरु सवाँ न को सगा, सोधी सईं न दाति ।
हरिजी सवाँ न को हितू, हरिजन सईं न जाति ।।

सतगुरु शब्द कमान ले, बाहन लागे तीर ।
एक जु बाहा प्रीति सों, भीतर बिंधा शरीर ।।

सत्यनाम का सुमिरन करे ले, कल जाने क्या होय ।
जाग जाग नर निज पासुन में काहे बिरथा सोय ॥

सौं बरसां भक्ति करै, एक दिन पूजै आन ।
सौ अपराधी आतमा, पड़ै चैरासी खान ॥

सीतलता तब जाणियें, समिता रहै समाइ ।
पष छाँड़ै निरपष रहै, सबद न देष्या जाइ ॥

सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय ।
कहैं कबीर सेवा बिना, सेवक कभी न होय ॥

शब्द बराबर धन नहीं, जो कोई जाने बोल ।
हीरा तो दामो मिले, शब्द मोल न टोल ॥

शीलवन्त सबसे बड़ा,सब रतनन की ख़ान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥

शूरा तो बहुत हि मिले, घायल मिले न कोय ।
घायल को घायल मिले, नाम भक्ति द्रढ होय ॥

श्रम से ही सब कुछ होत है, बिन श्रम मिले कुछ नाही ।
सीधे ऊँगली घी जमो, कबसू निकसे नाही ॥

सिंह अकेला बन रहे, पलक-पलक कर दौर ।
जैसा बन है आपना, तैसा बन है और ॥

सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार ।
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार ॥

सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप ।
यह तीनों सोते भले, सकित सिंह और साँप ॥

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह ।
शब्द बिना साधु नही, द्रव्य बिना नहीं शाह ॥

सुखिया सब संसार है, खावे और सोवे ।
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवे ॥

सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग ।
कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥

सुमिरन से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन ।
प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥

सुमिरन सूरत लगाईं के, मुख से कछु न बोल ।
बाहर का पट बंद कर, अन्दर का पट खोल ॥

सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार ।
होले-होले सुरत में, कहैं कबीर विचार ॥

सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल ।
बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥

सुरति करौ मेरे साइयां, हम हैं भौजल माहिं ।
आपे ही बहि जाहिंगे, जौ नहिं पकरौ बाहिं ॥

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर ।
तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर ॥

तन बोहत मन काग है, लक्ष योजन उड़ जाय ।
कबहु के धर्म अगम दयी, कबहुं गगन समाय ॥

तन की जाने मन की जाने, जाने चित्त की चोरी ।
वह साहब से क्या छिपावे, जिनके हाथ में डोरी ॥

तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोई ।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ ॥

तारा मंडल बैठि के, चांद बडाई खाय ।
उदय भया जब सूर्य का, तब तारा छिप जाय ॥

ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत ।
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥

तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय ।
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय ॥

तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥

टेक करे सो बावरा, टेक हि होवे हानि ।
जो टेक हि साहिब मिले, सोई टेक परमान ॥

तेरा साँई तुझमें, ज्यों पहुपन में बास ।
कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास ॥

तिमिर गया रवि देखते, कुमति गयी गुरु ज्ञान ।
सुमति गयी अति लोभाते, भक्ति गयी अभिमान ॥

तिनका कबहूँ न निंदिये जो पावन तर होए ।
कभू उडी अँखियाँ परे तो पीर घनेरी होए ॥

तू तू करता तू भया, मुझमें रही न हूँ ।
बारी फेरी बलि गई, जित देखू तित तू ॥

उज्जवल पहरे कापड़ा, पान-सुपरी खाय ।
एक हरि के नाम बिन, बाँधा यमपुर जाय ॥

उतते कोई न आवई, पासू पूछूँ धाय ।
इतने ही सब जात है, भार लदाय लदाय ॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

वैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥

वक्ता ज्ञानी जगत में, पंडित कवि अनंत ।
सत्य पदारथ पारखी, बिरले कोई संत ॥

वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल ।
बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल ॥

विषय त्याग बैराग है, समता कहिये ज्ञान ।
सुखदाई सब जीव सों, यही भक्ति परमान ॥

ये दुनिया है एक तमाशा, कर नहीं बन्दे किसी की आशा ।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, साँई भजे सुख होय ॥

यह मन ताको दीजिये, साँचा सेवक होय ।
सिर ऊपर आरा सहै, तऊ न दूजा होय ॥

यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो ।
बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो ॥

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
शीश कटे जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥

येही कारन तु जग में आया, वो नहीं तुने कर्म कमाया ।
मन मैला था मैला तेरा, काया मल मल धोय ॥

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